Monday, July 26, 2010

ASP (एस्प)








क्या है एस्प? एस्प एक प्रकार का जहरीला सांप होता है... जो डस ले तो इंसान पानी मांगने लायक भी ना रहे... कुछ ऐसे ही लोगों की मेहमाननवाजी हम करते आए हैं... कर रहे हैं और शायद करते रहेंगे... इशारा है अबु और कसाब जैसे लोगों की ओर... जिन्हें हम-आप आतंकवादी के तौर पर जानते हैं... वो शुरू से ऐसे थे... हालात ने ऐसा बनाया... इससे फर्क नहीं पड़ता... जो सच्चाई है वो ये कि हमारी सरकार इन्हें अपने दामाद की तरह रखती है... खातिरदारी ऐसी की किसी को ब्योरा देने की जरूरत नहीं...

ताजा मामला ही लीजिए... एक आतंकी ने दूसरे आतंकी पर जानलेवा हमला किया... पुलिस, प्रशासन सकते में आ गए... बकायदा इलाज करवाया गया... जान बचाने के लिए जेल तक बदल दी गई... आखिर ऐसा किया क्यों गया... दोनों पर केस चल रहा है... एक ना एक दिन सजा मिलेगी... अगर फांसी की सजा ना हो तो बेकार है हमारा कानून... आप खुद सोचिए... इनकी सुरक्षा पर साल में करोड़ों खर्च होते हैं... सुरक्षा से अलग इनकी जरूरतों पर लाखों खर्च होते ही होंगे... ज्यादा लगें तो भी आश्चर्च नहीं... खुद मुंबई के गृहराज्य मंत्री ने भी जेल का दौरा करने के बाद कहा कि अबु की बैरक में इंतजाम देखकर दंग रह गया... उसके कपड़े बाहर से धुल के आते हैं... कपड़े सलीके से रखें हैं... जेल की दीवारों पर मॉडल्स की तस्वीरें चस्पा हैं... दूसरी सुख-सुविधाएं भी हो तो आंखें मत फाड़िएगा... ये तो हमारी जेलों में नॉर्लम बाते हैं... लेकिन एबनॉर्मल ये लगा कि मंत्री जी इतना क्यों चौक गए... उनका भी कोई दूर या पास का साथी कभी न कभी तो जेल गया ही होगा... उस वक्त उसे भी वैसी ही सुविधाएं मिली होंगी जिसकी वो बात कर रहे हैं... तो इतना हल्ला क्यों... या कभी वो गलती से जेल चले गए तो क्या उन्हें ऐसी आलीशान खातिरदारी नहीं मिलेगी...

सुरक्षा इंतजामों की बात हो रही थी... मुंबई के गृहमंत्री आर आर पाटिल जी ने कहा है कि अबु सलेम के आरोपो की जांच होगी... कि उसकी जान को खतरा था... यानी अब सरकार ना सिर्फ आतंकियों की सुरक्षा करेगी बल्कि उनके लिए जांच और शायद मुकदमे भी लड़ेगी... वाह री सरकार वाह... आतंकियों की सुनवाई हो रही है और जब बिहार में सत्ता पक्ष का नेता गांव के लड़के को उलटा लटकाकर उसके तलवों पर लाठी बरसाता है तो लड़के के लिए कुछ नहीं किया जाता... सिर्फ नेता जी को पार्टी से निकालने का फरमान आता है... लड़का मर जाए, कोई अंग भंग हो जाए तो... तो क्या, नेता जी पर भी केस चलेगा... एक पार्टी ने निकाला है तो दूसरी पार्टी का टिकट मिल जाएगा... भारतीय राजनीति जिंदाबाद...

एक आतंकी दूसरे को मारता है तो मारने दो... बचा क्यों रहे हो... जब उन्होंने हजारों को मारा... लाखों को बर्बाद किया तब... इतने साल तक तो पहले अबु को पकड़ नहीं पाए... जब पकड़ भी लिया तो आठ सालों से उसे भी झेला रहे हो और जनता को भी... जब पकड़ा गया था तो मरियल सा दिख रहा था... अब देखो, हट्टा-कट्टा हो गया है... जितने उसके डोले हैं शायद उतनी मेरी जांघ होगी... दौसा को देखों... इतनी उम्र में तो हमारे आपके बुजुर्ग झुक जाते हैं ज्यादातर... वो इतना चुस्त है कि अबु जैसे पर ना सिर्फ धारदार हमला करता है बल्कि दो-चार हाथ भी लगा देता है... देश की जनता का हाल देखो... एक दिन मजदूरी ना करें तो शाम को फाका हो जाता है... तब सरकार उनको रोटी देने नहीं आती है... और आतंकियों को हफ्ते में एक दिन नॉन-वेज खिलाने का पैसा है सरकार के पास... ताकि कैदी तंदरुस्त रहें... अरे यार फांसी दो और खेल खत्म करो... जिसके बार में सभी की एक राय है... कोई भी मानवाधिकार संगठन खड़ा नहीं होने वाला कि क्यों ऐसे लोगों को फांसी दे रहे हो... तो लटका दो इन्हें... इंतजार क्यों और किसका...

क्या इंतजार एक और कंधार का है... एक छूटा है तो इतना हल्ला काट रहा है... दो-चार और छूट गए तो क्या होगा...

वैसे एक बात कहूं... हमारे जैसे लोग सिर्फ लिख ही सकते हैं... जब करने की बात आती है तो दस तरह की बातें सोचने लगते हैं कि क्या करें और क्या ना करें... शायद हम सिर्फ लिखने के लिए हैं... कुछ करने के लिए नहीं... ऐसा मुझे लगता है... कोई दिल पर ना ले... दिल पर ले अगर... तो फिर दिमाग में भी उतारे... तब तो कुछ बात बने... वरना आप कोसते रहो... देश के दामद बनकर तो वो ऐश कर ही रहे हैं...

Saturday, June 26, 2010

अभिमन्यु

एक अभिमन्यु महाभारत का था, ये अभिमन्यु भारत में था. वो अपने पिता से चक्रव्यूह को तोड़ने की कला अपनी मां के पेट से सीख कर आया था. ये अपने नाना से चक्रव्यूह रचने की कला सीख कर पैदा हुआ था. वो अभिमन्यु सातवां द्वार तोड़ना नहीं सीख सका था क्योंकि, उसकी मां सो गईं थी. ये अभिमन्यु भी कहीं चूक गया तभी तो बिखर गया.



मैं उस घटना की बात कर रहा हूं जो मेरे पैदा होने से साढ़े चार साल पहले, जून 1980 में घटी. वो अभिमन्यु रथ से गिरकर, अपनों के ही तीरों से भेद दिया गया था. ये अभिमन्यु अपने उड़न खटोले के साथ गिरा और कहने वाले तो ये कहते हैं कि इसे मारने की भी साज़िश अपनों ने ही रची.(इस बात को जोर दे कर इसलिए नहीं लिख रहा हूं क्योंकि, 8-10 आर्टिकल पढ़ लेने से, 10-20 लोगों से सुन लेने भर से आप उस वक्त की सच्चाई या सच्चाई के अहसास को नहीं जान सकते.)
उस अभिमन्यु ने अपने ही भाइयों और चाचा के विरुद्ध युद्ध लड़ा तो, ये अभिमन्यु भी अपने ही लोगों के लिए, अपनों से ही लड़ता दिखा. वो अभिमन्यु भी अपने शत्रुओं को पराजित करने के लिए उतावला था, इसका भी उतावलापन कुछ कम नहीं था. इस अभिमन्यु को हर चीज में आगे रहने, आगे बढ़ने, जीतने और कभी ना हारने का जुनून था. उस अभिमन्यु ने भले ही कभी राज ना किया हो लेकिन, इस अभिमन्यु ने राज किया, भले ही इसके हाथों में डोर नहीं थी, लेकिन सबकी लगाम यही कसता था. आलम ये था कि दरबार के मंत्रियों को इस अभिमन्यु की चप्पलें उठाते भी देखा गया.
उस अभिमन्यु के पिता का गांडीव गरजता था तो, इस अभिमन्यु की मां की हुंकार से सभी हिल जाते थे. वो अभिमन्यु भी हठी था तो, इसे भी कुछ कर गुजरना था, भले ही, उसके लिए कुछ भी कीमत क्यों ना चुकानी पड़े. इस अभिमन्यु ने कभी-किसी की परवाह नहीं की. उस अभिमन्यु के पिता को भी एक बार अहंकार ने जकड़ा था तो, इस अभिमन्यु की मां भी अहं का शिकार हुई. जब वो अभिमन्यु मारा गया तो उसके पिता उससे दूर कहीं और लड़ रहे थे. जब ये अभिमन्यु मरा तो उसके और उसकी मां के बीच की दूरियों की कहानियां सबके बीच चर्चा में थी.
उस अभिमन्यु ने महाभारत को जीत एक नया साम्राज्य खड़ा करना चाहा. इस अभिमन्यु ने भी भारत को बदल एक नए भारत का सपना संजोया. वो अभिमन्यु मारा गया, उसके पिता ने उसका बदला लिया, महायुद्ध जीता. मारा तो ये अभिमन्यु भी गया, लेकिन इसकी मां ने रोने के अलावा कुछ नहीं किया और इस अभिमन्यु का सपना अभी भी सपना ही है...

Tuesday, June 8, 2010

सरकार या दलाल ?
















मेरे ब्लॉग का ये पोस्ट पिछले पोस्ट की कड़ी मान कर पढ़ें. बुधवार 9 जून को भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े दो फैसले लिए गए. पहला, केन्द्र ने ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स का गठन किया, तो दूसरी ओर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज जी ने समीक्षा कमेटी बनाई. अगर यही करना था तो 25 साल इंतजार किस बात का किया. क्या भोपाल के लोगों की आहें, रोना और टीस सुनने में मज़ा आ रहा था.

इस घटना से जुड़े एक तथ्य पर गौर करें तो पता चलता है कि ये कांड उस वक्त हुआ था जब कांग्रेस की सरकार थी. फैसला तब आया है जब कांग्रेस की सरकार है. लेकिन इसमें एक और तथ्य भी हैं. आज जो स्थिति है, वो भी कांग्रेस सरकार की ही वजह से है.

2-3 दिसंबर 1984 को जब ये हादसा हुआ उस वक्त राजीव गांधी जी प्रधानमंत्री थे, अर्जुन सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और पी वी नरसिम्हा राव गृहमंत्री थे. हादसे के बाद यूनियन कारबाइड के वॉरेन एंडरसन को गिरफ्तार भी गिया गया था. लेकिन महज कुछ घंटों बाद ही उसे जमानत पर छोड़ दिया गया. ये कोई गलती नहीं थी. गलती इसके साथ हुई. जमानत के साथ एंडरसन पर इस बात की पाबंदी नहीं लगाई गई कि वो देश छोड़कर नहीं जा सकता. साथ ही एंडरसन ने वादा खिलाफी की. उसने कहा था कि केस के मामले में जबभी जरूरत पड़ेगी वो सहयोग देने भारत आएग. लेकिन ऐसा कुछ भी ना हुआ, ना हो रहा है. एंडरसन ने ढिलाई का फायदा उठाया और अमेरिका के लिए उड़ गया. यहीं से कहानी में ट्विस्ट आता है. वॉरेन एंडरसन भागा नहीं बल्कि बगाया गया. तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को एक फोन आया. फोन दिल्ली से आया था. फोन का असर ऐसा था कि तत्कालीन मुख्य सचिव ने भोपाल के कलेक्टर और एसपी को बुलाकर एंडरसन की जमानत करवा दी और उसे दिल्ली भेजवा दिया, वो भी बकायदा राज्य सरकार जहाज में. जिसे कैप्टन सैय्यद हामिद अली उड़ा रहे थे(बेचारे सरकारी ऑर्डर का पालन कर रहे थे). अर्जुन सिंह को किसका फोन आया था ये आज भी यक्ष प्रश्न है. अर्जुन सिंह आज भी खामोश हैं, कुछ नहीं बोल रहे हैं. सवाल यहीं उठता है, क्या अर्जुन सिंह को प्रधानमंत्री राजीव गांधी जी का फोन आया था या गृहमंत्री पी.वी नरसिम्हा राव का?

इसके पहले सीबीआई के पूर्व निदेशक आर बी लाल भी ये मान चुके हैं कि एजेंसी पर सरकारी दबाव होता. उनके पास भी विदेश मंत्रालय से एंडरसन के लिए फोन आया था. गौर करने वाली बात ये है कि उस वक्त विदेश मंत्रालय राजीव गांधी देख रहे थे क्योंकि, उस समय विदेश मंत्री दिनेश सिंह बीमार पड़ गए थे.

राजीव गांधी को हमेशा भविष्य का नेता कहा गया. भारत में आईटी क्रांति लाने का श्रेय उन्हें ही जाता है. अपने नाना की तरह वो भी विदेशियों से काफी अच्छे संबंध रखते थे. शायद इसीलिए उनके हाथ में भी नाना की तरह ही विदेश मंत्रालय था. बोफोर्स में भी राजीव जी का नाम आया. यहां भी राजीव जी हैं. वहां भी विदेशी बचा, यहां भी विदेश बच रहा है. बोफोर्स में भी सौदा हुआ था. भोपाल में भी यूनियन कारबाईड ने 4 करोड़ 70 लाख का मुआवजा देकर, सौदा ही तो किया. कारबाईड ने अपने आदमी को बचा लिया. आज अमेरिका खुलकर कह रहा है कि उसका भोपाल से कोई लेना-देना नहीं है. भोपाल हमारे न्याय क्षेत्र से बाहर है. यहां अमेरिका की ताकत का अंदाजा लगाइये. अमेरिका वियतनाम और इराक में तो न्याय का हवाला देता है, लेकिन भोपाल उसके न्याय क्षेत्र से बाहर है. पिछले महीने की ही बात कीजिए जब, ब्रिटिश कंपनी की गलती की वजह से मैक्सिको की खाड़ी में तेल का रिसाव हुआ. अमेरिका ने ब्रिटेन पर खासा दबाव बनाया और अब कोरड़ो पाउंड का हर्जाना मांग रहा है. वो ताकत का ढोल बजाता है और हम चुप हो जाते हैं. जबकि ढोल अंदर से खोखला ही होता है.

भोपाल का हाल सिर्फ नेताओं की देन नहीं है, इसमें ब्यूरोकेसी भी शामिल है, भले ही वो ये कहें कि हमारे ऊपर सरकारी दबाव था. दबाव था तो 25 साल बाद क्यों बता रहे हैं. उसी वक्त क्यों नहीं बोले? क्या किसी का डर था? कानून की बात करें तो पिछले ही साल शायद लॉ कमीशन ने ये मांग की थी कि 340 ए में भी दस साल की कैद का प्रावधान किया जाए. उसपर हमारे कानून मंत्री श्री विरप्पा मोइली ने कोई एक्शन नहीं लिया. कुछ करते तो शायद आज दो साल नहीं दस साल की सजा होती. खुद ही सोचिए कि 15 हजार मौतों और ना जाने कितनी हजारों की जिंदगी को मामूली रोड एक्सिडेंट की, लापरवाही की धारा से जोड़ दिया गया. विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों ही कठघरे में हैं.

हालांकि, अब ओबामा के ऊपर भी एंडरसन को भारत को सौंपने के लिए दबाव बन रहा है. अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य फ्रांक कॉलिन ने ओबामा से कहा है की एंडरसन का गुनाह बहुत बड़ा है और उसे फौरन भारत के कानून के हवाले कर देना चाहिए. उम्मीद करनी चाहिए कि ऐसा कुछ चमत्कार हो, सालों बाद ही सही कम से कम सही और सच्चा न्याय तो मिले.

Monday, June 7, 2010

25 हजार, 25 साल, 25 मिनट, 25 हजार !


जो फैसला सोमवार 7 जून को आया उसके बारे में बात ना ही की जाए तो बेहतर होगा, क्योंकि ये फैसला राहत नहीं देता, इंसाफ की महक नहीं फैलात. ये फैसला जख्मों को एक बार फिर से कुरेद गया. जाहिर कर गया कि इस देश में न्याय में देरी ही नहीं है, सच कहा जाए तो न्याय ही नहीं है. हमारा सर्वोपरी कानून कहता है कि एक बेगुनाह को सजा नहीं होनी चाहिए, भले ही सौ गुनहगार छूट जाए. और इस बात पर हमारा कानून पूरी तरह से अमल भी करता है. बेगुनहा को सजा हो या ना हो लेकिन सौ गुनहगार जरूर छूट जाते हैं.

ये सवाल आप से पूछता हूं, आखिर 25 साल में फैसला आने का क्या मतलब है? क्या कानून बीते 25 सालों में हुई टीस की भरपाई कर सकती है? क्या जहरीली गैस से प्रभावित लोगों के बेकार हो चुके अंगों में जान लाई जा सकती है? ये तो तभी नहीं हो सकता था जबकि फैसला 6 महीने या साल भर में हो जाता. लेकिन उस वक्त कम से कम ये तो हो ही सकता था की पीड़ितों के अंदर कानून के लिए शायद थोड़ी इज्जत बन जाती, पर जो हुआ वो उनके साथ किसी भद्दे मजाक से कम नहीं है. 25 साल फैसला आता है, सज़ा का ऐलान होता है और महज 25 मिनट के अंदर ही 25 हजार रुपए पर जमानत मिल जाती. उनका क्या जो 25 साल पहले मर गए, उनका क्या जो पिछले 25 सालों से मर रहे हैं और आगे ना जाने कब तक सिसकते रहेंगे. यही हमारा कानून है?

पिछले 25 सालों से कई सवाल हमारे आपके सामने हैं, लेकिन उनके जवाब भी शायदा उसी टॉक्सिक मेथाइल आइसोसाइनाइट गैस में विलीन हो गए जिसने हजारों का दम घोट दिया, लाखों को अपनी एड़ियां घिस-घिसकर मौत का इंतेजार करने के लिए छोड़ दिया.

कुछ बातें उनकी कर ली जाएं जिन्हें दोषी करार दिया तो गया लेकिन फिर आजाद कर दिया गया. मुख्य अभियुक्त जिसे वॉरेन एंडरसन जो इस त्रासदी का सूत्रधार था उसे तो कभी पकड़ा ही नहीं गया, आरोप होते हुए भी उसकी चमड़ी बेदाग है, बाकी आरोपियों में से एक आर.बी. राय चौधरी की मौत हो गई है. वहीं दोषी करार दिए गए यूनियन कारबाइड इंडिया के तत्कालीन निदेशक केशब महेंद्रा के साथ विजय गोखले, किशोर कामदार, जे मुकुंद, एसपी चौधरी, केवी शेट्टी और एसआई कुरैशी को सिर्फ 2 साल की सजा और एक लाख का जुर्माना लगाया गया, लेकिन अफसोस उन्हें भी 25 हजार की रकम पर खुली हवा में सांस लेने के लिए छोड़ दिया गया.

क्या हम अपने कानून को मानने के लिए बाध्य हैं? क्या हम कोई क्रांति नहीं कर सकते? क्या आंदोलन करने का जमाना लद गया, सिर्फ गांधी के जमाने में आंदोलन होते थे?

आपके विचार के इंतेजार में...

Monday, April 19, 2010

ओले-ओले-ओले....



जब भी कोई लड़की देखूं मेरा दिल दिवाना बोले ओले-ओले-ओले---- ओले-ओले-ओले.... गाऊं तराना यारा झूम-झूम के हौले-हौले----- ओले-ओले-ओले....

ये गाना फिल्म "ये दिल्लगी" का है... जो 1994 में आई थी... पात्र थे अक्षय कुमार, काजोल और सैफ अली खान... इस फिल्म के दो गाने बहुत हिट हुए थे... एक की लाइनें ऊपर लिख दी है... दूसरे गाने की लाइनें इस तरह से हैं...

नाम क्या है, प्यार का मारा... घर का पता दो, दिल है तुम्हारा... क्या करते हो, तुमसे प्यार... इसका नतीजा, जो भी हो यार... जो भी हो यार...

इस गाने को लिखने वाले के मन में ये गाना तब आया था जब वो मुंबई की बारिश में फंस गए थे और उनकी कार पर ओले गिरने शुरु हुए.

अब मुद्दे पर आ जाऊं नहीं तो ब्लॉग पढ़ने वाले भाग जाएंगे. पहली लाइन और विडियो को देखकर आप समझ ही गए होंगे कि मैं 'ओलों' की बात कर रहा हूं. सालों बाद ओले गिरते देखे. देखकर मन बहुत खुश हुआ. बचपन के वो दिन याद आए कि कैसे हम स्कूल जाते या आते वक्त ओले गिरने पर उन्हें अपनी वॉटर बॉटल में भर लिया करते थे. जिसकी बॉटल एयर टाइट होती थी उसके ओले देर तक वैसे ही ठोस बने रहते थे. जिसकी वॉटर बॉटल सामान्य होती थी, उसके ओले पानी हो जाते थे. चिढ़ाने में बड़ा मजा आता था.

आज नोएडा ऑफिस में काम कर रहा था तो अचानक मौसम ने पलटी खाई, बादल मचल-मचल कर आए, हवा बौरा गई, और गिरने लगे ओले. तब मेरे मन में कौंधा ये गाना " जब भी कोई लड़की देखूं मेरा दिल दिवाना बोले ओले-ओले-ओले---- ओले-ओले-ओले.... गाऊं तराना यारा झूम-झूम के हौले-हौले----- ओले-ओले-ओले.... "

तभी शोर होने लगा, इनपुट से आवाज आई, ब्रेकिंग मारो आउटपुट को... दिल्ली में पानी बरसा, नोएडा में ओले गिरे. सुनकर हंसी आ गई. ओले गिरना भी ब्रेकिंग बन सकता है. हम तो अपने घर-गांव में ना जाने कितनी बार ओले देख चुके थे. लेकिन ऑफिस के अंदर का माहौल एकदम से बाहर के मौसम की तरह बदल गया. लोग खिड़की की तरफ ओले देखने के लिए भागे. जैसे आसमान से ओले नहीं हीरे गिर रहे हों. बाद में कुछ लोगों से बात हुई तो पता चला कि उन्होंने ओले पहली बार देखे हैं

दोष मेरे मित्रों का नहीं है, शायद उन्होंने दिल्ली में कभी ओले गिरते नहीं देखे या फिर, सिर्फ कहावत में ही सुना है कि... सिर मुड़ाते ओले पड़े. मैं उनका मजाक नहीं उड़ा रहा हूं. सिर्फ इतना सोच रहा हूं कि हमलोग क्या-क्या खोते जा रहे हैं. अपने पर्यावरण को कितना बेगाना बनाते जा रहे हैं. बच्चों की किताबे देखता हूं तो कई ऐसी चीजें दिखती हैं जो हमने देखी है और आज वो सिर्फ किताबों में ही देख रहे हैं, मसलन, घर के रोशनदान से गौरेया का घोंसला गायब हो गया है और गायब हो गई हैं उसकी गौरेया भी. अब आम के पेड़ों पर तोते कम ही दिखते हैं. चील, गिद्ध तो ना जाने कहां उड़ गए हैं. ऐसी कई चीजे हैं जो हम खोते जा रहे हैं. जरूरत पर्यावरण को बचाने से ज्यादा खुद को बचाने की है... सोचिए...


ओले-ओले-ओले....ओले-ओले-ओले....ओले-ओले-ओले....ओले-ओले-ओले....

Sunday, March 28, 2010

कहां जा रहा है माओवाद...?



खतरे का निशान लाल रंग का होता है. भारत में माओवाद लाल रंग का पर्याय बन चुका है. बिहार, झारखण्ड, उडिसा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल वो इलाके हैं जहां माओवाद का जाल बेहद मजबूती से बुना हुआ है. लेकिन अब ये जाल और भी महीन और ताकतवर होने वाला है. वजह है माओवाद का कॉरपोरेट कल्चर. जी हां माओवादी कॉरपोरेट कल्चर अपना रहे हैं. और बकायदा बेरोजगारों को तीन हजार रुपए महावार पर नौकरी दे रहे हैं. इतना ही नहीं अगर उगाही ज्यादा की तो इन्सेंटिव भी मिलेगा. जी हां, ये एक भयानक सच है, जो आने वाले समय की तस्वीर की बानगी है. माओवाद की वो ललकार, जिसकी गूंज अभी भले ही ना सुनाई दे, लेकिन जब ये गूंज सुनी जाएगी तब तक शायद बहुत देर हो चुकी हो. माओवादी भारत की बेरोजगारी, अशिक्षा और पिछड़ेपन का सहारा लेकर ऐसी घात करने की ताक में हैं, जिसकी चोट बहुत गहरी होने वाली है.

तनख्वाह में मिलेंगे 3000 रु/ महीना, काम बढ़िया करने पर इनसेंटिव भी मिलेगा. सच मानिए ये किसी कॉरपोरेट कंपनी का विज्ञापन नहीं है. ये विज्ञापन है माओवादियों का उन बेरोजगार युवकों के लिए जिनके पास ना तो नौकरी है, ना तो खाने के लिए दो जून की रोटी का जुगाड़. बस इसी का फायदा उठाकर माओवादियों ने शुरू कर दी है रिक्रूटमेंट, गरीब और बेरोजगार युवकों को दी जा रही है तीन हजार रुपए प्रति महीना की नौकरी. अगर ये लड़के किसी से पैसों की ज्यादा उगाही कर लाते हैं तो इन्हें अलग से इनसेंटिव भी दिया जाएगा. सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि माओवादी नेतृत्व वाले नक्सल प्रभावित राज्यों के पिछड़े इलाकों में माओवादियों की ये स्कीम बखूबी काम भी कर रही है. सोचिए खुद अधिकारी इस बात की पुष्टी कर रहे हैं. नक्सलियों के हमलों और उनसे अपनी सुरक्षा के डर से नक्सल प्रभावित राज्यों के उद्योगपति, व्यापारी, ठेकेदार और यहां तक कि कुछ सरकारी अधिकारी पहले से ही माओवादियों को पैसे देते आए हैं. अब जबकि माओवादी खुलकर भर्ती कर रहे हैं तो इसका अंजाम क्या होगा, कोई भी इसका अंदाजा आसानी से लगा सकता है. सिर्फ भर्ती ही क्यों, माओवादी तो अफीम की खेती भी कर रहे हैं. अपहरण का धंधा तो पहले से ही चल रहा है. अब तो इनके कैडर में काम करने के लिए लड़के हैं, अफीम की खेती से पैसा आ रहा है, और अपहरण कर पैसे पहले से कमाए जा रहे हैं. यानी पूरा का पूरा माओवाद मुड रहा है नए, आधुनिक, तेज-तर्रार व्यवस्था और रणनीति के साथ, अपना रहा है कॉरपोरेट कल्चर. वो दिन दूर नहीं जब माओवादी CEO अपने आंकड़े वेब साइट पर कुछ इस तरह से देंगें....

1. युवकों की जरूरत, महीने की तनख्वाह, इंसेंटिव, खाना और रहने की जगह मुफ्त.
2. बीते बिजनेस इयर में हमने इतने अपहरण किए, इतनी रैनसम ली.
3. कुल टर्न ओवर इतने रुपए का.
4. इनपुट रकम इतनी, आउटपुट रकम उतनी.
5. पुलिस, सुरक्षा एजेंसियों की वजह से इतने का घाटा.
6. अगले बिजनेस इयर के लिए इतने की भर्ती और इतनी उगाही का टारगेट.
7. ज्यादा जानकारी और जुड़ने के लिए यहां सम्पर्क करें.

हालांकि, माओवादियों की रणनीति के काट के तौर पर सरकार ने आठ राज्यों के 34 जिलों पर अपनी नजर गड़ा दी है. इसके अलावा, गृह मंत्रालय राज्य पुलिस बलों की भी क्षमता बढ़ाने पर विचार कर रहा है. दूसरी ओर केन्द्रीय बलों की तैनाती कर खुफिया जानकारी को बांटना, प्रशिक्षण में मदद पहुंचाने की प्रक्रिया भी तेज कर दी गई है. इसके बावजूद भारत में बढ़ती माओवाद की गंभीर समस्या को इसी से समझा जा सकता है कि पिछले साल हुई माओवादी हिंसा में करीब 1000 लोगों ने अपनी जानें गंवाई, जो 1971 के बाद सबसे बड़ा आंकड़ा है.

माओवाद का पक्षधर नहीं हूं क्योंकि, इसके बारे में जानकारी सीमित है. लेकिन इतना तो कह सकता हूं कि माओवाद अपनी दिशा से भटक रहा है. आपसे पूछता हूं, कहां जा रहा है माओवाद...?

Friday, March 12, 2010

खेल का खेल !


खेल, जीवन का अहम हिस्सा. खेलने से ना सिर्फ शरीर दुरुस्त बनाता है बल्कि, दिमाग को भी सही समय पर सही निर्णय लेने की तरकीब आ जाती है. और अब तो वो कहावत भी झूठी पड़ गई है कि 'पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे तो बनोगे खराब' अब तो हातल ये है कि जो पढ़ता है वो खोता है और जो खेलता वो खेलता है पैसों में.

खेल को लेकर इतनी भूमिका इसलिए बांध रहा हूं क्योंकि जिस खेल के बारे में लिखने जा रहा हूं उसको मैंने कभी नहीं खेला. एक बार फील्ड पर गया तो हॉकी की बॉल उधार मांगकर ले आया और MNIT के बेकार पड़े स्वीमिंग पूल में उससे क्रिकेट खेलनी शुरू कर दी. शायद मेरे ही जैसों की वजह से हॉकी की इतनी बदतर हालत हुई है. 12 मार्च को भारत विश्व हॉकी कप में अपना अंतिम मैच भी अर्जनटीना से 2-4 से गंवा बैठा. दुःख हुआ, और इसके पीछे भी मैं अपने को ही जिम्मेदार मानता हूं, क्योंकि हॉकी खेलने आती तो क्या पता आज मैं टीम में होता और 1-2 गोल कर दी देता. वैसे बता दूं कि मेरे नाना जी और मामा जी दोनों ही हॉकी खिलाड़ी रह चुके हैं. लेकिन मेरा मन कभी हॉकी में नहीं लगा. शायद इसीलिए मम्मी ने भी क्रिकेट नहीं खेलने दी, हॉकी के लिए कहता तो क्या पता हामी भर दी जाती.

पर अब क्या? क्या फिर से हॉकी के साथ वही सलूक किया जाएगा, जो रवैया विश्वकप के पहले था. खेलने के लिए सुविधाएं नहीं, अच्छी किट नहीं, बढ़िया कोच नहीं, सही रणनीति नहीं. क्या खुद को गलाकर खेलें हॉकी हमारे हॉकी खिलाड़ी ?

कुछ दस दिन पहले लुधियाना से एक खबर आई थी कि, अंडर 14 और अंडर 16 के हॉकी खिलाड़ियों को हॉस्टल में 2 दिन तक खाना नहीं मिला. ये मजाक नहीं है, कड़वा सच है. अंडर 14 और अंडर 16 के हॉकी खिलाड़ी जिन्हें कल को राष्टीय खेल का परचम बुलंद करना है, उनको 2 दिन खाना नहीं मिला. ऐसा नहीं है कि बच्चे भूखे रहे, अपने पैसों से खाना खरीद कर खाया. पढ़ना हो तो सेल्फ फाइनेन्सड कोर्स में दाखिला लो, खेलना हो तो खुद के पैसों से खेलों, नौकरी करनी हो तो यंग एंत्रप्रेन्योर बन जाओ. सेल्फ स्किल्ड बनों, मल्टी स्किल्ड बनों पर किसी तरह की मदद की उम्मीद मत करों. भला ऐसे में आप कैसे किसी खिलाड़ी से गोल्ड या विश्वकप की उम्मीद कर सकते हैं.

एक सवाल जो मेरे मन में है, आप सब के बीच भी पहुंचाना चाहता हूं. टीवी पर सहवाग, प्रियंका चोपड़ा और ओलंपिक शूटर राज्यवर्धन सिंह राठौर हमारी हॉकी टीम के लिए प्रमोशन करते दिखे. लेकिन इनमें से कोई भी हॉकी मैच देखने स्टेडियम पर नहीं पहुंचा. अगर पहुंचा, तो मैं ये चाहूंगा कि मेरी नॉलेज को पूरा करने के लिए ऐसी कोई फोटो या विडियो क्लिप आप में से कोई भी मुझे मेरे ई-मेल (ankura107@gmail.com) पर भेजे दे. आप सब खुद इस बात को समझिए कि कोई भी खिलाड़ी तब तक अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकता है जब तक कि उसे हमार-आपका साथ नहीं मिलता. क्रिकेट इसीलिए सफल हुआ क्योंकि क्रिकेट को बच्चा-बच्चा पसंद करता है. बच्चा ठीक से खड़ा होना भी सीख नहीं पाता और पापा उसके हाथ में बैट थमा देते हैं. बेटा बनेगा तो सचिन ही बनेगा. दूसरों को क्या कहूं मैं खुद दो चार हॉकी खिलाड़ियों के अलावा किसी और का नाम नहीं जानता.

खैर जो हुआ सो हुआ. अब नई शुरुआत करनी है. हॉकी के लिए एक साथ खड़ा होना है. कोशिश यही रहेगी कि एक दूसरे के साथ हॉकी से हॉकी मिलाकर खड़े हों.